Friday, November 30, 2012

aaj fir paani barsa

 
 

आज फिर पानी बरसा,
सूखी  माटी पी गयी हर बूँद 
और इसी जमीन पर मैं खड़ी 
ढूँढती अपनी हँसी ,
तितलियों सी उडती थी 
आज तेरे हाथों में मसली गयी 
तारों सी झिलमिल करती थी 
आज अंधेरों में दबी है कहीं।
मैं नहीं, ना  मेरा वजूद ,
तू सही, तू ही हर जगह मौजूद ,
मेरी बात नहीं, तेरा साथ नहीं,
ये घर अब घर न रहा ,
ईंट - रेत  का मकान ही सही।
सपने नहीं,उम्मीदें दम तोड़ चुकी,
ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नयी ?
इस सवाल से घिरी आज मैं खड़ी 
आज फिर पानी बरसा,
सूखी माती पी गयी हर बूँद,
आंसूं से खुद को सीनचती 
तेरी परछाई में खुद को  रही ढून्ढ।

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प्रेम सहित , Ibeingme  को भेँट .


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